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अम्मा 

​-जतिन कुमार 

उन्हें ऊंचा सुनाई देता था। मैं ज़ोर से उनके कान के पास जाकर बोला “अभी नहीं आई हैं।आएंगी तो मैं बता दूंगा”।
 

वह मुँह लटकाते हुए भीतर चली गईं । अपने कमरे में । छोटा कमरा था । कुटिया जैसा । कमरे के बीचों-बीच एक खटोला(छोटी खाट) रखा हुआ था । जिसपर हल्के नीले रंग का गंदा बिछईया बिछा हुआ था । माँ ने कई बार कहा था “लाइए इसे साफ कर देती हूँ ।” अम्मा हमेशा मना कर देतीं । हवा करने के लिए बीजना, खटोला की अदमायन की तरफ रखा हुआ था । वह सीधे जाकर अपने खटोले पर लेट गईं । उन्हें कुछ बेचैनी जैसी महसूस हो रही थी । बोलने लगीं “आ जाए तो मुझे बता देना ।” यह उन्होंने खटोले पर लेटे-लेटे ही बोला था ।
 

“ठीक है” मैंने जवाब दिया 

माँ घर पर नहीं थीं । वह खेत पर पिताजी के साथ सरसों निकलवाने गईं थीं । मैं खेलने के लिए घर से निकल गया । चोथा, मंदिर के पीछे वाली जगह पर मेरे इंतजार में था । मैं दौड़कर उसके पास पहुंचा । 

“लाया है न ?” मैंने पूछा 

“हाँ ! बहुत हैं ।” 

“निकाल, खेलते हैं ।”

चोथा ने अपने निक्कर की जेब से कंचे निकाले । बहुत सारे थे । कुछ जमीन पर गिर गए । कुछ उसके हाथ में बज रहे थे । मैंने उसके हाथ से अपने पिट्ठू कंचे उठा लिए । पास पड़ी मोटी लकड़ी से जमीन खोदी । पैर से उसे गोलाई में घुमाकर एक बिल बना ली । बिल के ठीक एक कदम की दूरी पर लकड़ी से लाइन खींचकर उसे सीप का नाम दे दिया । खेल चालू हुआ । चोथा अंट बिल अच्छा खेलता था । आसान खेल था । एक जन को बिल से अपने कंचे को कुछ दूरी पर रखना होता था । दूसरा जन सीप से अपने कंचे को बिल में घुसाता, फिर पहले जन के कंचे को बिल से पीटता । खेल चलता रहा । घंटा कब बीत गया पता ही नहीं चला । मुझे अम्मा की याद आई । मैंने कंचे चोथा को वापस दिए । अपने कपड़े झाड़ते हुए मैं घर की तरफ दौड़ा । मैंने देखा किवाड़ का पलड़ा खुला हुआ था । मैं चुपके से घर के अंदर घुसा । माँ ने किचन से आवाज़ लगाई । 

“कहाँ था ?” माँ धीरे से बोलीं 

मैं चुप खड़ा रहा । 

“अम्मा घर में अकेली थीं । रुक जाता उनके पास ।”

मैं अब भी कुछ नहीं बोला । माँ लगातार मुझे सुनाती रहीं । वह चुप हुईं । 

“ बाहर जा, पानी से अपने पैर धो ले । कितने गंदे हो रहे हैं । अपने पापा से खाने लिए भी कह दे । फूलसिंह के चौंतरा पर बैठे होंगे ।”

मैं बाहर गया । पैर धोए । पिताजी को लिवा लाया । पिताजी ने घर के बाहर चौंतरे पर खाट बिछाई । मैं उन्हें खाना दे आया । माँ रोटियाँ सेक रहीं थीं । मैं माँ के पास पटला लेकर बैठ गया । 

“कब आएंगी बुआ ? अम्मा सुबह से पूछ रहीं थीं ।” मैंने माँ से पूछा 

“कह तो आज ही की रहीं थीं । आईं नहीं । क्या पता शाम तक आ जाएं ।”

“दीक्षा भी आएगी बुआ के साथ ?”

“हाँ”

मैं मुस्कुराने लगा । 

“ले पापा को रोटी दे आ ।”

उन्होंने मेरे हाथ से रोटी ली ।  पिताजी खाना खा चुके थे । वह खटिया पर लेट गए । माँ ने भी खाना खा लिया था । वह भी दोपहर की औंग लेने लगीं । मैं अम्मा के कमरे में गया । वह अभी तक सोई हुईं थीं । मैंने उन्हें नहीं जगाया । मैं घर में अकेला था । जब कुछ करने को नहीं दिखा तो माँ के बगल में जाकर लेट गया । मैं लेटे हुए बरसाती को देख रहा था । आसमान साफ था । लगातार देखने पर एक-दो कौए दिख जाते । मैं दीक्षा के बारे में सोच रहा था । मेरी बुआ की लड़की । पिछली बार जब वह गर्मियों की छुट्टियों में गाँव आई थी तो हमनें बहुत मजे किए थे । मैं न जाने उसे कहाँ-कहाँ लेकर घूमा था । मैंने उसे चोथा से भी मिलवाया था । दीक्षा की चोथा से अच्छी दोस्ती हो गई थी । जब दीक्षा अपने घर जा रही थी तो चोथा उदास हो गया था । चोथा ने मुझसे पूछा था “दीक्षा अगली छुट्टियों में भी आएगी न ?”

 

दरवाज़ा खटखटाने की आवाज आती है । मैं उठा । किवाड़ खोलीं । बुआ थीं । दीक्षा भी । मैंने उन्हें अंदर आने के लिए कहा । पिताजी उनके आने से जाग गए थे । मैंने माँ को जगाया । वह उठीं । बुआ से मिलीं । दीक्षा ने माँ और पिताजी के पैर छूए । बुआ ने अम्मा के बारे में पूछा 

“गोलू, मम्मी कहाँ हैं ?”

मैं उन्हें कुटिया में ले गया । अम्मा अभी भी सोई हुईं थीं । मैंने उनका कंधा ज़ोर से हिलाया । वह उठ गईं । बुआ के आने की खुशी, मैं उनकी आँखों में देख सकता था । एक बहु सास के लिए कितना भी कर ले, लेकिन बेटी, बेटी ही होती है । अम्मा, पिताजी और बुआ अब आँगन में बैठे हुए थे । अम्मा, बुआ से उनके घर की खबर ले रहीं थी । पिताजी फूफाजी के बारे में पूछ लेते । अब कहाँ हैं ? नौकरी ठीक चल रही है न ? अनुज के क्या हाल हैं ? उसे क्यों नहीं लाई ? 

माँ किचन में थीं । उन्होंने मुझसे बिस्किट-नमकीन लाने के लिए कहा । बुआ ने दीक्षा को साथ चलने के लिए कह दिया । दीक्षा मेरे साथ थी । मैं उससे तरह-तरह के सवाल कर रहा था । वह भी मुझसे कुछ न कुछ पूछे जा रही थी । 

“पिछले एक साल में तुझे मेरी याद आई थी ?” मैंने पूछा 

“नहीं”

मैं उदास हो गया । 

उसने मेरी ठुड्डी को पकड़ कर अपने चेहरे की तरफ़ घुमाया । 

“बहुत याद आया तू यार !” वह बोली 

मेरा चेहरा खिल उठा । हम दोनों बातें करते हुए दुकान पर पहुँच गए । मैंने एक पार्ले-जी, एक ट्वेंटी-ट्वेंटी, और दस रुपए की नमकीन ली । दीक्षा ने मुझे एक चॉकलेट दिलाई थी-डेरीमिल्क । हम घर पहुंचे । माँ ने चाय बना ली थी । मैं बुआ के लिए एक प्लास्टिक की ट्रे में चाय, बिस्किट और नमकीन ले गया था । अब माँ भी पिताजी और बुआ के साथ बैठ गईं । दीक्षा, पिताजी के बगल में बैठी हुई थी । मैं बुआ के । 

“और गोलू, कौन-सी क्लास में आ गया तू ?” बुआ ने पूछा 

मैं कुछ बोलता उससे पहले ही पिताजी बोल पड़े 

“आठवीं के पेपर दिए हैं अभी तो, देखो क्या होता है ?”

“सही है” बुआ ने चाय की चुस्की लेते हुए कहा । 

“दीक्षा बेटा तुम बताओ, तुम्हारे दसवीं के पेपर कैसे गए ?” पिताजी ने दीक्षा से पूछा 

“अच्छे गए हैं मामाजी, टीचर अच्छे से कॉपियाँ चेक करें तो बात बने” वह थोड़ा हँसते हुए बोली 

पिताजी हंस दिए । बुआ मुँह बनाकर दीक्षा को देखने लगीं । अम्मा मस्त से बिस्किट चाय में डुबो रहीं थीं । मेरी चाय कप से छलक कर नीचे फर्श पर गिर गई ।

पिताजी चाय का आखरी घूंट लेते हुए बोले 

“वैसे दसवीं में ही पता चलता है कि आगे चलकर, कौन बनेगा घोड़ा और कौन बनेगा खच्चर ?”

 

अगले दिन सुबह, मैं जल्दी जग गया । मैं दीक्षा के पास गया । वह सोई हुई थी । मम्मी से पता चला “दीक्षा, मम्मी और बुआ ने रात को खूब गप्पे लड़ाएं हैं । इसलिए सोने में देरी हो गई ।” मैंने हल्के से उसके गाल पर मोरपंख घुमाया । उसके होंठ हिलने लगे । मैं मोरपंख को कानों के पास ले गया । वह डरते हुए उठी । मैं हंसने लगा । 

“क्या करता है यार, कितना अच्छा सपना देख रही थी ! कोई मेरे गालों पर मोरपंख घुमा रहा था । तूने आकर सब खराब कर दिया ।”

“ऐसी बात है तो तू सो जा । मैं चला जाता हूँ ।” मैं शर्मिंदा होते हुए बोला 

“अरे अब क्या ही सोऊँगी । आठ बज गए हैं । नहा ही लेती हूँ ।” 

दीक्षा नहाने चली गई । माँ ने चाय सुबह ही बना ली थी । अब वह ठंडी हो चुकी थी । मैं किचन में गया । चाय गरम की एक स्टील की प्लेट ली । उसमें पाँच-छः बिस्किट डाले, चाय का कप रखा । मैंने प्लेट कमरे में बिछे बेड पर रख दी । दीक्षा आई । उसने गुलाबी रंग का सूट पहना था । बाल गीले थे । वह शीशे के सामने देखते हुए अपनी गर्दन घुमाती तो उसके गीले बालों की छींटें मेरे मुँह पर पड़तीं । उसने तौलिये से अपने बालों को सुखाया । बालों को गूँथकर एक चोटी बना ली । सीधे हाथ में चूड़ीदार सफेद रंग का कड़ा पहना । दूसरे हाथ में घड़ी । उसके हाथों पर लड़कों जैसे बाल थे । जिन्हें मैं लगातार देखे जा रहा था । वह तैयार हो गई । मैंने उसे चाय देते हुए कहा 

“तू रोज़ ऐसे ही तैयार होती है क्या ?”

“हाँ । क्यूँ पूछ रहा है ?” उसने अपना कड़ा सेट करते हुए बोला 

“नहीं बस ऐसे ही”

उसने बस दो बिस्किट ही खाए थे । चाय पूरी पी ली थी । मैं मम्मी और बुआ को बोलकर दीक्षा को बाहर घुमाने ले गया । 

“बता सबसे पहले कहाँ जाएगी ?”

“कहीं भी ले चल । सब कुछ तो देखा हुआ है ।”

“चोथा के घर चलें ?”

“हाँ, चल ।”

हम दोनों चोथा के घर गए । चोथा घर पर नहीं था । उसके पापा ने बताया “वह स्कूल के सामने खेलने गया है ।”

मैं दीक्षा को लेकर स्कूल पहुंचा । चोथा कबड्डी खेल रहा था । वह आउट हुए प्लेयरों में बैठा हुआ था । उसे कबड्डी खेलने का बहुत शौक था । वह मुझसे भी अक्सर खेलने के लिए कहता था । लेकिन मेरा शरीर यह खेल खेलने की इज़ाजत नहीं देता था । फ़ालतू में हड्डी-वड्डी टूट गई तो लेने के देने पड़ सकते थे । मैंने उसे आवाज़ लगाई 

“योगिंदर !”

चोथा का असली नाम योगिंदर था । मैं उसे, सबके सामने चोथा कहकर नहीं बुलाता था । दोस्ती में भी एक दायरा जरूर होना चाहिए । दायरे दोस्ती बिगाड़ते नहीं । उसे और मजबूत बनाते हैं । 

उसने मुझे देख लिया । वह भागता हुआ मेरे पास आया । 

“अरे दीक्षा ! तू कब आई ?”

“कल ही आई हूँ ।”

हम तीनों बातों में लग गए । चोथा के साथियों ने उसे वापस खेलने के लिए बुलाया । चोथा ने मना कर दिया । हम तीनों दौड़कर खेतों की तरफ़ गए । 

 

हम तीनों खेत पर थे । खेत चोथा का था । मैं और दीक्षा खटिया पर बैठे हुए थे । बांस की जेबरियों से बनी खाट थी । चोथा हम दोनों के पास ही बैठा हुआ था । मूढ़ा पर । 

“योगी तेरे नौंवीं के पेपर कैसे गए ?” दीक्षा ने पूछा 

दीक्षा, चोथा को योगी बुलाती थी । वह मुझसे अक्सर कहती थी । “कितना तो अच्छा नाम है योगिंदर, तू उसे चोथा क्यूँ बुलाता है ।” चोथा मेरे द्वारा चोथा बुलाने पर कभी बुरा नहीं मानता था । शायद यही दोस्ती की खासियत भी होती है कि दोस्तों को पता होता है, लोगों के इरादों के बारे में । इरादे ही बताते हैं कि लोग आपसे कितना प्यार करते हैं ? आपको कितना पसंद करते हैं ? उन्हें किन बातों का बुरा लग सकता है और किन बातों का नहीं ?

“ठीक गए हैं । पास तो हो ही जाऊंगा ।” चोथा बोला 

दीक्षा ने हल्के से गर्दन हीला दी । मैं खाट पर बैठे हुए, अगल-बगल फैले पेड़ों को देख रहा था । हम तीनों नीम के पेड़ के नीचे बैठे हुए थे । नीम का पेड़ छाँव के लिए बहुत अच्छा माना जाता है । 

चोथा उठा । 

“कहाँ जा रहा है ?” मैं पेड़ों को देखते हुए बोला 

“टूअल चलाने, पापा ने कहा है खेतों में पानी लगाने को ।”

“अच्छा अच्छा ।”

खेत पर एक छोटी होंधी बनी हुई थी । टूअल का पानी होंधी में होते हुए खेतों तक जाता था । चोथा ने जैसे ही टूअल चालू किया, दीक्षा खुश हो गई । होंधी के ठीक ऊपर एक मोटी पाइप लगी हुई थी । उसी के सहारे पानी होंधी में जा रहा था । होंधी के भीतर पानी के झाग उफ़ान मार रहे थे । दीक्षा का नहाने का मन हो रहा था 

“मैं जाऊँ इसमें नहाने ?” उसने मुझसे पूछा 

“पर तू तो नहा चुकी है न ?”

“हाँ ! पर मेरा बहुत मन है । नहाने का ।”

“वो ठीक है, लेकिन क्या पहनेगी तू नहाने के बाद ? ये तो भीग जाएंगे ।”

“धूप में बैठ जाऊँगी । सूख जाएंगे ।”

“और तबीयत खराब हो गई फिर ? बुआ मेरी जान खा जाएंगी । ”

“कुछ नहीं कहेंगी । और वैसे भी कहीं नहीं हो रही तबीयत खराब ।” 

दीक्षा ने अपनी चप्पलें उतारीं । घड़ी मुझे पकड़ाई और कूद गई । वह मजे से पानी उड़ाते हुए नहा रही थी । वह पानी में डुबकी लगाती और तुरंत ही मुँह बाहर निकाल लेती । वह लगातार ऐसे ही करती रही । चोथा खेतों को देखने गया हुआ था । दीक्षा होंधी से बाहर निकली । उसका गुलाबी सूट उसके बदन से चिपटा हुआ था । मुझे उसे देखते हुए शर्म आ रही थी । दीक्षा ठिठुरते हुए मेरे पास आई । 

“अब क्या हुआ ? पहले तो बड़ा कह रह थी कुछ नहीं होगा । लग गई न सर्दी ।”

“यार सर्दी नहीं लगी है । पानी बहुत ठंडा हो गया है इसलिए थोड़ी कंपकपी छूट रही है । बस ।”

मैंने चोथा को बुलाया । उससे तौलिया मांगी । उसके पास गमछा था । वह गमछा ले आया । मैंने गमछा दीक्षा को दे दिया । दीक्षा धूप में बैठे हुए गमछे से अपने बाल पोंछने लगी । जब उसके कपड़े सूख गए तो मैंने उसे चलने के लिए कहा 

“चलें अब ? घर पर सब इंतजार कर रहे होंगे ।”

“हाँ चलते हैं । योगी को बाय बोल देते हैं ।”

चोथा आया । दीक्षा ने उसे गमछा वापस किया । हम दोनों चोथा को बाय बोलकर घर को चल दिए ।  

 

मैं और दीक्षा घर पहुंचे । अम्मा चौंतरा पर लेटी हुई थीं । माँ, बुआ और पिताजी चटाई डालकर वहीं अम्मा के पास बैठे हुए थे । 

“अम्मा ठीक हैं न ?” मैंने माँ से पूछा 

“नहीं, तबीयत ज्यादा बिगड़ गई है । बोल भी नहीं पा रहीं । डॉक्टर को बुलाया है । वही बताएगा अब तो, आखिर बात क्या है ।” माँ उदासी भरे स्वर में बोलीं 

हम दोनों सबके साथ वहीं चटाई पर बैठ गए । डॉक्टर आया । जवान लड़का था । वह मोटरसाइकिल से उतरा 

“क्या हुआ भाई, पचोरी जी नहीं हैं क्या दुकान पर ?” पिताजी बोले 

“नहीं अभी नहीं आए हैं । आते ही होंगे । मुझसे आने को कह दिया है । ”

“तुम ठीक से देख तो लोगे न ? ”

“आप चिंता मत करिए । बी.ए.एम.एस किया हुआ है । अच्छे से जांच करूंगा । ”

मैं भागकर डॉक्टर के लिए एक कुर्सी ले आया । डॉक्टर अम्मा के सिर के पास कुर्सी लगाकर बैठ गया । वह कभी स्टेथोस्कोप, अम्मा की छाती पर रखता । कभी थर्मामटर उनकी काँख में लगाता । उसने आँखों में टॉर्च मारकर उनकी आँखें भी देखीं । बीस मिनट तक शरीर के अंग-अंग को जाँचने के बाद डॉक्टर कुर्सी सरकाते हुए हमारे पास आया । उसने पिताजी से कहा 

“बुखार तो नहीं है । लेकिन आँखें बहुत पीली पड़ चुकी हैं । ठीक से सांस भी नहीं ले पा रहीं हैं । कुछ कह नहीं सकते कि कितने दिन जिंदा रहेंगी । ” डॉक्टर बोला 

सबके चेहरे उतर गए । बुआ रोने लगीं । 

“देखिए आप रोइए मत । जो आया है, वह जाएगा भी । उम्र भी बहुत लगती है अम्मा की । ”

“नब्बे की हैं” मेरे मुँह से निकला 

“पचोरी जी आ जाएं तो उन्हें भेज देना ” पिताजी बोले

पिताजी एक आस लिए हुए थे जिसमें एक डॉक्टर की पढ़ाई पर सवाल उठ रहा था । 

“जी बिल्कुल” डॉक्टर बोला 

शाम हुई । पचोरी जी आए तो उन्होंने भी वही कहा जो जवान लड़का बता कर गया था । पचोरी जी अम्मा के जाने का लगभग समय बता गए थे। एक हफ्ता । पूरा परिवार उदास था । पिताजी ने अम्मा की तबीयत की खबर सभी रिश्तेदारों  को बता दी । रिश्तेदार घर आते तो तरह-तरह की बातें करते । 

“पहले ही किसी बड़े हॉस्पीटल में दिखाना चाहिए था ।”

“बहु ने लगता है ठीक से ध्यान नहीं रखा माताजी का ।”

“अब उम्र भी हो गई है तो कितना ही जियेंगी ।”

छठवें दिन, शाम पाँच बजे अम्मा का देहांत हुआ । पिताजी रो रहे थे । मैंने उन्हें दूसरी बार रोते हुए देखा था । पहली बार वह बाबा के जाने पर रोए थे । माँ को गाँव की औरतों ने घेरे हुए था । वह सभी उनके साथ रो रहीं थीं । बुआ माँ के शव के पास बैठीं रो रहीं थीं । दीक्षा ने उनके कंधों को अपने दोनों हाथों से पकड़ा हुआ था । मैं भीड़ से अलग एक पत्थर पर बैठा हुआ था । मेरे आँसू बीच-बीच में मेरी आँखों से छलक पड़ते । चोथा मेरे पास बैठा, मुझे रोते हुए देख रहा था । उसकी आँखों में आँसू नहीं थे । वहाँ पर मौजूद आधे से ज्यादा लोगों की आँखों में आँसू नहीं थे । आँसू यादों  के होते हैं, उन लम्हों के होते हैं जो आपने उस व्यक्ति के साथ बिताए हैं । अम्मा को उठाकर बांस के डंडों पर लिटा दिया । सभी गाँव वाले उनके शव के पीछे हो लिए । उन्हें जलाया गया । मैं अम्मा को जलते हुए देख रहा था । एक टीस थी जो मेरे भीतर उठ रही थी । “क्या उस दिन मेरे घर रुकने से अम्मा जिंदा होतीं ? नहीं, वह तो कब से बीमार थीं मेरे उस दिन रुकने से क्या ही हो जाता ?” सभी लोग एक-एक करके अपने-अपने घर को चल दिए । मैं, चोथा और कुछ लोगों के साथ मेरे मन में दौड़ रहे विचारों के साथ घर पहुंचा ।

अम्मा के जाने के बाद सभी रिश्तेदार धीरे-धीरे जाने लगे । बीस दिन बीत गए । पूरा घर खाली था । बस हम छः लोग बचे थे घर में । माँ, पिताजी, बुआ, दीक्षा, अनुज (दीक्षा का भाई) और मैं ।

“तू कब जाएगी ?” पिताजी ने बुआ से पूछा 

“कुछ दिनों के बाद सोच रही हूँ जाने का । अनुज के स्कूल शुरू होने वाले हैं । दीक्षा का एडमीशन भी कराना है ग्यारवीं में ।” बुआ बोलीं 

“ठीक है, तू परसों चले जाना”

“ठीक है भैया ।”

वो लोग मंगलवार, अट्ठाईस जून को गए । दीक्षा का इस बार का जाना पिछली बार से अलग था । इस बार वह गर्मियों की छुट्टियों की यादें नहीं, एक जख्म लेकर जा रही थी । उसे पिछली छुट्टियाँ भले याद न रहें । ये वाली जरूर रहेंगी । जैसा कि गुलज़ार साहब कहते हैं “उदासी ज़रा देर तक ठहरती है ।” वैसे ही पीड़ा मस्तिष्क में रह जाती है, खुशी किसी राख की तरह हवा में उड़ते-उड़ते गायब हो जाती है । 

 

मेरा आठवीं का परिणाम अच्छा आया था । दीक्षा ने भी अपनी दसवीं में अच्छे अंक प्राप्त किए थे-अटहत्तर परसेन्ट । चोथा फेल हो गया था । हमारी सरसों अच्छी हुई थी । उसे बेचकर चालीस से पचास हजार का धन घर में आया था । बहुत समय के बाद पिताजी खुश थे । माँ खुश थीं । मैं खुश था ।   

अगली सुबह वो घर आई तो लोग उसे देखते रह गए। कसकर पीछे बंधे बालों पर नीली पगड़ी, पति का झूलता कुर्ता, लाल पाढ़ वाली मटमैली धोती और हाथ में लाठी - बिसेसरा बो को ये क्या हो गया था?

आजी ने चिढ़कर पूछा, ''का हो गइल बा तहरा हो बाबू? इ का रंग-रूप ह?''

उसका जवाब था, ''अब इहे रूप रही आजी। हम हो बाबू हो गइनी। अपन बेटी के माई भी हम, बाप भी हम। कहब त राउर दुआर छोड़ देब लेकिन इन रूप ना छोड़ब।''

कुछ दिनों तक तो सबने सोचा, पति से नाराज़गी है, उतर जाएगी। गांववाले किस्म-किस्म की बातें करते रहे, कई अफवाहें भी उड़ीं। लेकिन हो बाबू टस से मस ना हुई। दिन-दर-दिन बेटी को बगल में दबाए वो काम पर उसी वेशभूषा में लौटती रही। सोनहुला गांव की हो बाबू के चर्चे दूर-दूर तक पहुंचे। लेकिन किवंदती बनी हो बाबू के अंदर की मां को किसी ने नहीं सराहा। जो पत्नी पिटती रही, वो मां ज़ुल्म बर्दाश्त ना कर सकी। 

सुनती हूं कि उस बेटी को हो बाबू ने गोपालगंज पढ़ने भेजा, और आज वो किसी हाई स्कूल में पढ़ाती है। हो बाबू का आंगन नवासों से गुलज़ार है, लेकिन उनका रूप नहीं बदला। पगड़ी के नीचे के बाल चांदी हो गए, लेकिन पगड़ी का रंग फीका ना पड़ा। आज भी हो बाबू कलफ वाला कुर्ता और लाल किनारे वाली धोती के साथ खादी का गमछा लटकाए घूमती है।

***

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अनु सिंह चौधरी एक फ़िल्मकार, स्क्रीनराइटर, एडिटर, अनुवादक, स्तंभकार, और एक्स-पत्रकार हैं। इनकी तीन किताबें भली लड़कियाँ, बुरी लड़कियाँ (उपन्यास; 2019), नीला स्कार्फ़ (कहानी-संग्रह; 2014), और मम्मा की डायरी (मेमोआर; 2015) हिन्द युग्म से प्रकाशित हैं। गांव कनेक्शन के लिए रिपोर्टिंग करते हुए इन्हें प्रतिष्ठित रामनाथ गोयनका अवॉर्ड और लाडली अवॉर्ड से सम्मानित किया गया। ये 2020 वेब ड्रामा सीरीज़आर्या की सह-लेखिका भी हैं। 

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