नींद

-श्रुति

(पूर्व चेतावनी: यौन शोषण, आघात )

वैसे तो लखनऊ दिल्ली से ज्यादा दूर नहीं, पर गर्मी के मौसम में रोड ट्रिप की थकान बदन में सुस्ती सी भर देती है। पूरा रास्ता बैठे बैठे ही तो निकल जाता है, फिर भी मंजिल पहुंच कर पैर फैलाए अंगड़ाई लेने का चैन ही कुछ अलग है। लगता है बस पसर जाएं बिस्तर पर, और सारी थकान दूर कर लें।

तब मेरे कॉलेज की गर्मी की छुट्टियाँ चल रहीं थीं। सभी दोस्त कहीं न कहीं बाहर जा रहे थे। सभी दोस्तों से किसी बात पर रूठा-कानी भी चल रही थी, तो मन ही मन में एक ज़िद पकड़ ली थी कि ये छुट्टियाँ अपने दोस्तों से तो बेहतर ही बिताउंगी।

उस ही दौरान एक दिन शीला मौसी घर पर मिलने आईं। वैसे तो वह हमारी सगी रिश्तेदार नहीं हैं, पर प्यार अपनों से भी बढ़कर रहा है उनसे। उनकी बेटी मिथिला भी काफी मिलनसार है। दिल्ली में हमारा घर आस पास होने के कारण हर अगले दिन मिलना-जुलना लगा ही रहता।

इस बार मिथिला की गर्मी की छुट्टियों में मौसी उसे अपने लखनऊ वाले पुश्तैनी घर ले जाने का सोच रही थीं। दिल्ली से बाहर निकलने का ज़िक्र हुआ नहीं कि मैंने भी उनके साथ जाने की ज़िद ठान ली, और यूं ही झट पट हमारा अगले दिन की रोड ट्रिप का प्लान भी बन गया। बस फिर क्या था- फ़ौरन एक बैगपैक में कपड़े बांधे, चुपके से अपने वो डेनिम शौर्ट्स भी रख लिए जो मम्मी दिल्ली में तो कभी पहनने ही ना देतीं, और निकल पड़ी शीला मौसी के साथ उस रात उनके घर ही ठहरने।

पूरी रात उतावलेपन में नींद ही नहीं आ रही थी। झपकी लगते ही आँख खुल जाती और लगता के कहीं निकलने का समय तो नहीं हो गया। ना जाने फिर कब नींद आई, सच कहूं तो नींद आई भी या नहीं, ये भी नहीं पता। उस ही आधी नींद-आधे चैन में कब गाड़ी से निकले और कब सफ़र गुज़रता गया कुछ ध्यान ही नहीं। याद है तो वो उत्सुकता जिसकी मानो कोई सीमा ही न थी।

लखनऊ पहुँची तो जाना कि यह कोई पुश्तैनी घर नहीं, पुश्तैनी महल था मानो। फूलदार बगीचों के बीच सफेदी में लिपटी यह इमारत जैसे किसी फिल्म का सेट हो। सफ़ेद बेदाग़ दीवारें, कुछ मखमल और कुछ जाली के पर्दों से ढकी बड़ी बड़ी खिड़कियाँ, झूमर से सजीं ऊंची छतें- सब स्वयं ही इतने पूर्ण थे, कि किसी अन्य सजावट की ज़रुरत ही नहीं।

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यह घर तो ‘एक महल हो सपनो का’ से भी बड़ा था पर यह ‘कहानी घर घर की’ नहीं थी, शायद यही तो है ‘कसौटी जिंदगी की’। मन ही मन में अलंकारों से भरे खयाली पुलाव पका कर खुद ही खिल्कारियाँ ले रही थी, तभी गिरीश अंकल हमें रिसीव करने आए।

गिरीश अंकल शीला मौसी के पति हैं। हमारे साथ वक़्त बिताने शूटिंग से 10 दिनों की छुट्टी ले कर बॉम्बे से लखनऊ पहुंचे हुए थे। आज तक जिन्हें सिर्फ टीवी पर देखा था, वो इस पल मुझे गले लगा कर ‘वेलकम होम’ कह रहे थे। जिन सिरीयल के सेट याद कर रही थी, उन्ही का एक पात्र वैसे से ही एक घर से निकल कर मुझे अपनी दुनिया से रूबरू कराने ले जा रहा था। क्या रोमांचक अनुभव था वो तब मेरे लिए!

अब सोचती हूँ तो लगता है कि क्या ही ख़ास था उस घर में, उस शहर में, जो मैं इतनी पगलाई जा रही थी। अभिनेता हो या नेता, भगवान तो नहीं था वो, जो उसके सामने घुटने टेक लिए थे मैंने।

वो ऊंची दीवारें, दीवारों पे लगीं भारतीय इतिहास की गवाह तस्वीरें, उन कमरों की सफेदी, उन पर्दों की सिलवटें, उस कार्पेट की मखमलता, उस कम्बल का सुकून- यहाँ सब घेरे हुए थे मुझे। ‘आलीशान’ शब्द का मतलब सीख रही थी मैं। इस मतलब को अब जी रही थी मैं।

अराम से करवट लिए, दोहर ओढ़े, तकियों और मसनदों से घिरी, ख्यालों में खोए खोए जाने कब आँख लग गई। कुछ देर बाद किसी धमाके की आवाज़ से झटके से नींद खुली, तो पहले तो थोड़ा समय यही समझने में लग गया कि ये कैसे सपनों से घर में आ गईं हूँ मैं। फिर से एक जोर की आवाज़ आई तो ध्यान गया की बाहर बेहतरीन बारिश हो रही है, बिजली कड़क रही है। बरसात की गीली मिट्टी की सौंधी खुशबू दिल्ली से लखनऊ क्या, पूरे जिंदगी भर की थकान दूर कर रही थी जैसे। अगले ही क्षण पर्दों पर ध्यान गया, तो सोचा झटपट उन्हें एक तरफ कर, बारिश से बचा लूँ, कहीं मैले ना हो जाएँ। पर उठना चाहा, तो हिलना ही मुमकिन ना लगा। शरीर पर एक भारीपन महसूस हुआ। मेरी कमर पर किसी का हाथ था।

‘मैं डर गई’ कहना काफी तो नहीं, पर उस एहसास को लफ़्ज़ों में बयान करना भी मेरे लिए असान नहीं होगा। बिना हिले डुले भी मैं अपनी धड़कनें ज़ोर ज़ोर से सुन सकती थी। मेरा माथा बिलकुल सुन्न था। शरीर बिलकुल ठंडा और कान एकदम गर्म हो गए थे। तलवों में झुन्झुन्नी जकड़े हुए थी और हाथ जैसे बर्फ की जंजीरों में बंध गए थे।

मैंने अपनी आँखें जोर से बंद कर लीं। यह समझ नहीं आ रहा था कि अभी सपने में हूँ, या जाग चुकी हूँ। वाकई कमर पर किसी का हाथ है भी, या कोई तकिया? सोचा अपनी श्वास रोक कर बिलकुल शव सामान लेटी रहूँ और ज़रा आंकूं कि कमर पर जो ‘हाथ’ है, वह जीवित है या कोई वस्तु। इससे पहले की कुछ आगे सोचती या समझती, मेरे पीछे लेटा इंसान मुझमे पीछे से और चिपक गया, अपने शरीर को मेरी पीठ से रगड़ते हुए और करीब आ गया और अपने हाथ से मुझे और दबा लिया, जैसे नींद में किसी तकिये को और जोर से पकड़ लिया हो।

मैं तिलमिला कर उठी तो देखा बगल में गिरीश अंकल सोए हुए थे। मैं समझ नहीं पा रही थी कि ये वास्तव में सो रहें हैं, या नींद में होने का नाटक कर रहें हैं। बिजली फिर कड़की, पर वे नहीं उठे। मैं जानबूझ कर ज्यादा आहटें करती हुई बिस्तर से उतरी, और पर्दे हटाते हुए खिड़की खोलने-बंद करने का नाटक करने लगी। तभी गिरीश अंकल अपनी आँखें मचलते हुए उठे, और कहा, “अरे बिटिया, तुम कब जागी?”

“बस अभी।”

“तुम तो ढंग से सोई ही नहीं पर। समय क्या हो रहा है?”

वे ऐसे बातें कर रहे थे जैसे कुछ हुआ ही नहीं था। उनके मुँह से निकला ‘बिटिया’ शब्द अभी बहुत अटपटा लग रहा था। वे अपनापन तो झलका रहे थे, पर ये अपनापन मुझे परेशान कर रहा था।

अंकल ने अपने मोबाइल में खुद ही टाइम देखा, और “ज़रा कुछ नाश्ता पानी का इंतज़ाम देख आऊँ” कहते हुए बिस्तर से उतरे। तब मेरी नज़र उनके बगल में सोई नन्ही सी मिथिला पर गई। वह अब भी गहरी नींद में थी। खुद से बड़े नाप के तकिये पर, छोटा सा मुँह खोले गहरी श्वासें लेते हुए मज़े में सो रही थी मीट्ठी।

उसे देख जैसे पल भर के लिए अपनी बेचैनी भूल ही रही थी मैं कि अंकल मेरे पास आ कर खड़े हो गए, “कितना सुन्दर लग रहा है ना!”

चेहरे पर एक मुस्कान चिपकाए, मैं खिड़की कि तरफ घूम गई और एक साइड को हो गई।

“मीट्ठी ज़िद पकड़े हुए थी कि मेरे पास ही सोएगी। उसे ही सुलाने आया, और खुद सो गया देखो।” धीरे धीरे और भी कुछ कुछ कहते हुए वह करीब आते रहे, फिर बहुत करीब आ गए। फिर बगल से गले लगाते हुए, मेरे गाल चूमे, और चले गए।

मौसी भी जब घर आया करतीं थीं, तो जाते वक़्त ऐसे ही बगल से गले लगातीं और गाल चूम कर अलविदा लेतीं। और मीट्ठी को तो हर वक़्त दुलार करते-करवाते रहना इतना पसंद था कि उसने अपना जिंगल भी बना रखा था- मीट्ठी की मीठी मीठी म्मूआह। पर तब कभी ऐसी आपत्ति या असुविधा तो नहीं महसूस हुई। बड़े घरों का शायद ऐसा ही प्रचलन होता होगा, क्या पता, मुझे ही आदत न थी।

तभी मेरे मोबाइल पर शीला मौसी का कॉल आया। कमरे दूर दूर होने के कारण घर में रह कर भी सब यहाँ फोन पर ही बात किया करते थे। उन्हेंने मेरे और मीट्ठी के बारे में पूछा और कहा कि खाना तैयार होने में थोड़ा वक़्त बाकी है, तो मैं कुछ देर और सो लूँ। दरवाज़े की कुंडी ना लगाऊँ, ताकि जब खाना लगे, तो वह आकर हमें जगा देंगी।

फोन एक तरफ रख कर, मैं कुछ देर खिड़की के पास ही बैठी रही, बाहर देखती रही, फिर सोचा कि थोड़ा अराम कर ही लेती हूँ। पर वही गद्देदार आरामदायक बिस्तर अचानक डरावना सा दिखने लगा।

मैं पहली बार अपने परिवार से दूर थी। अपने घर में भी कभी अकेले नहीं सोई थी। कभी बहनें, तो कभी मम्मी पापा हमेशा ही साथ सोते थे। हाँ, घर तो यहाँ से काफी छोटा था हमारा पर जगह पूरी होती, तब भी हम सब साथ ही सोया करते। मीट्ठी की ओर देखा तो अपना घर याद आ गया, और आंसू छलक गए। बिस्तर के दूसरी ओर जा कर मैं मीट्ठी के सिरहाने बैठ गई और उसका सिर सहलाने लगी। गीली मिटटी की सौंधी खुशबू कमरे को महका रही थी, कहीं से विंड चाइम्स के खनकने की भी आवाज़ आ रही थी। मैंने आँखें बंद की और लगा कि बस अभी के लिए और कुछ नहीं सोचना, थोड़ी नींद लेनी है और फ्रेश हो कर उठना है।

आँखे बंद करीं ही थीं कि कमर पर वह हाथ फिर महसूस हुआ। इस बार तुरंत चौकन्नी हो कर उठी तो देखा कोई नहीं था।

धड़ल्ले से उठी, और जा कर दरवाज़े की कुंडी लगा दी। पर वापस बिस्तर की ओर कदम ही नहीं बढ़ रहे थे। खिड़की के पास जा कर ज़मीन पर बैठ गई और दीवार से सिर टिका लिया। फर्श के इस हिस्से में कार्पेट नहीं था, तो ठण्ड भी लग रही थी, पर बिस्तर से दोहर ले कर आने का भी मन नहीं कर रहा था। आने वाले दिनों में मौसम के साथ साथ वह बिना कार्पेट की फर्श भी खुद-ब-खुद गर्म लगने लगी।

 

अपने परिवार वालों के सामने अंकल मेरे लिए कुछ विशेष चिंता जताया करते थे। ऐसा बर्ताव करते जैसे कि मुझे उचित ध्यान और मार्गदर्शन की ना जाने कितनी ज़रुरत हो। घर वालों के सामने वह ऐसी छवि बना रहे थे जैसे कि मुझे ग्रूमिंग क्लास दे रहे हों। साधारण घर की लड़की है, थोड़ा बहुत नुक्कड़ नाटक कर भी लिया तो इसे क्या पता टीवी की दुनिया कितनी अलग होती है! वही सिखाने के लिए तो वह मेरे इर्द गिर्द रहा करते थे हर वक़्त। अपनी कहानी सच्ची साबित करने के लिए उन्होंने तो पहले ही दिन मुझसे एक टॉप-10 लिस्ट भी बनवा ली थी, जिसमे वह सभी चीज़ें लिखीं थी जो उनके हिसाब से मेरा लक्ष्य होना चाहिए। मेरी मूल लिस्ट की ख्वाहिशें- ‘हर दिन चैन की नींद’, ‘एक छोटा सा खुद का सजाया हुआ घर’ और ‘अच्छी युनिवर्सिटी से उच्च शिक्षा’- फाड़ कर फेंक दीं गईं थीं और नई लिस्ट इमला कराई गई थी। इस लिस्ट में मेरी ख्वाहिशों की जगह ‘हिरोइन बनना’, ‘विदेश यात्रा’, ‘बड़ी गाड़ी’, ‘बँगला’, ‘महंगे जूते, बैग और कपड़े’ ने ले ली थी। यह लिस्ट लिखते लिखते मुझे हंसी भी आ गई थी कि ये सब मेरे शौक कभी हो ही नहीं सकते। पर उस हंसी से पहले मुझे क्या पता था कि इस ही हंसी की तारीफ़ करके अंकल मेरे होंठ चूमने लग जाएंगे, ना ये अंदाज़ था अगले कुछ मिनटों में वह मुझे बार बार चूमने और इधर उधर छूने की कोशिश करते रहेंगे।

गिरीश अंकल का रवैया दिन-पर-दिन बदलता जा रहा था। उनकी नीयत साफ़ नहीं थी, इस बात में दोराय नहीं थी। एक दिन खाना खाते वक़्त मीट्ठी ने यह बात भी छेड़ दी थी कि ‘पापा मेरे पास सोने मत आया करो, जगह घेर लेते हो आधी से ज्यादा’। तब उन्होंने मज़ाक मज़ाक में बात बदल दी।

अंकल ने अब तक मुझसे ये बातें जान ही लीं थी कि अपने परिवार के बिना यह मेरा पहला वेकेशन था, मैं स्मोक और स्मोक-अप नहीं करती थी, मैंने न कभी शराब पी थी, ना कभी सेक्स किया था। इन बातों को ले कर उन्होंने मुझमे इतना हीनता का भाव भर दिया था, कि मैं खुद को इस बड़े से घर में और भी छोटा महसूस करने लगी थी।

हम सब हर रोज़ कहीं न कहीं घूमने जाया करते थे। कुछ ख़ास मनोरंजन तो नहीं होता था, पर उस कोठी की चुभती हुई सफेदी से दूर रहना ही बेहतर लगता था। मीट्ठी भी बोर होने लगी थी। उसने एक दिन पास वाली डांस अकादमी में दाखिला लेने की ज़िद ठान ली। एक ही हफ्ता तो बचा था लखनऊ में, उसमे क्या ही सीख लेते, पर मौसी ने भी सोचा कि अपनी ही अकादमी है, हम क्लास जाने लगेंगे तो वहां के मास्टर जी का टेस्ट भी हो जाएगा।

अपने कॉलेज में अभी तक मैंने हर एक्स्ट्रा करीकुलर गतिविधि में हिस्सा ले रखा था, सिवाए डांस के। डांस से अलग ही झिझक होती थी मुझे। ऐसे लगता था कि सब मुझे जज करेंगे, मेरा मज़ाक उड़ाएंगे क्योंकि सौ बात की एक बात, डांस और मैं- ना बाबा ना!

यहाँ मेरे पास दो ही विकल्प थे, या तो मैं डांस क्लास में दाखिला लेती, या फिर दिन के वो दो घंटे मैं घर पर अकेली बिताती। अकेले रहने का मतलब होता कि अंकल कभी भी कुछ भी करते रह सकते थे मेरे साथ। बिना सोचे समझे मैंने डांस क्लास के लिए हाँ कर दी।

जहां पहले प्रोग्राम यह था कि मौसी हमे डांस क्लास लेने व छोड़ने जाया करेंगी, अचानक ही वह ज़िम्मेदारी भी अंकल ने अपने सिर ले ली।

मुझे बिना सोए कुछ तीन-चार दिन हो चुके थे। अब खाना खाने का भी मन नहीं करता था। भूख लगती ही नहीं थी। हर वक़्त डर घेरे रहता था। शीला मौसी चिंतित भी होतीं कि मैं कुछ ढंग से खाती क्यों नहीं; मेरे लिए अलग अलग तरह के पकवान भी बनवातीं, पर जितना मसालेदार पकवान, उतना ही मेरा मन फीका हो जाता था। ऐसे में अब मुझे डांस क्लास भी शुरू करना था। एक तो डांस वैसे ही नहीं होता मुझसे, ऊपर से दस लोगों के बीच घंटो नाचना पड़ेगा, ये सोच सोच कर ही थकान और बढ़ जा रही थी।

पहले दिन क्लास के लिए तैयार हो कर जब अपने कमरे से निकली, तो मौसी, अंकल और मीट्ठी पहले ही गाड़ी में इंतज़ार कर रहे थे। आदत से मजबूर अंकल को अनावश्यक चिंता तो जतानी ही थी, तो मुझे देखते ही कहते, “ये कैसे कपड़े पहन रखें हैं तुमने?”

धूप की वजह से मीट्ठी चिड़चिड़ी हो ही रही थी, तो मौसी ने कहा, “अरे क्या दिक्कत है इन कपड़ो में? चलो, चलते हैं, अब देर हो रही है।”

“ऐसे कैसे देर हो रही है? हमारी अकादेमी है। हमारा इंतज़ार नहीं करेगा तो किसका करेगा वो मास्टर। ऐसे कपड़ों में ये डांस कैसे कर पाएगी? मैं इसे चेंज करवा के लाता हूँ अभी।”

मैंने एक कुरता और घर के पजामे पहन रखे थे। अब डांस क्लास के हिसाब से तो कपड़े ले कर नहीं आई थी मैं लखनऊ। पजामे अरामदायक रहेंगे, यही सोच कर पहन लिए थे।

मौसी चिड़कती रहीं, पर अंकल नहीं माने। मेरे साथ कमरे में गए और पूरा बैगपैक बिस्तर पर उझल दिया। एक ब्रा उठा कर बोले, “ये वाली क्यों नहीं पहनती कभी?”

“..”

“बिटिया, तुम्हे तो वाकई शौपिंग की ज़रुरत है। इनमे से तो कोई कपड़ा नहीं चलेगा।” कुछ देर फैले हुए कपड़ों को देखा, और अपनी पहनी हुई शर्ट उतार ली। “इसे पहन के दिखाओ एक बार”।

“मुझे ये नहीं आएगी, अंकल।”

“अरे इसे बॉयफ्रेंड शर्ट की तरह पहना जा सकता है। ढीले कपड़ो का फैशन है आज कल। आओ मैं तुम्हे पहना कर दिखाता हूँ।”

“नहीं, मैं खुद पहन लूंगी।” मैंने उनके हाथ से शर्ट ली और यह आँपते हुए कि उनका कमरे से बाहर निकलने का कोई इरादा नहीं, उसे अपने कुरते के ऊपर ही पहनने लगी।

“अरे यह क्या कर रही हो। ऐसे तो फिटिंग पता ही नहीं चलेगी।”

“यह वैसे ही काफी बड़ी है, मेरा इसे पहनने का कोई फायदा नहीं।’

“बाहर मीट्ठी और मौसी इंतज़ार कर रहे हैं। अभी बहस का समय नहीं है। चलो फ़टाफ़ट कुर्ता उतारो और शर्ट पहनो।”

“आप बाहर जाइए। मैं ट्राय कर के बता दूँगी।”

“फिर टाइम वेस्ट करने वाली बात कर रही हो। कुरता उतारो चलो फ़टाफ़ट।”

“मुझसे नहीं होगा। आप प्लीज़ बाहर जाइए।”

“हद है इस लड़की की भी। ठीक है जाता हूँ। बाहर ही खड़ा हूँ कमरे के। जल्दी कपड़े बदलो।”

वे बाहर गए, मैंने कमरे की कुंडी लगाई और शर्ट पकड़ कर बैठ गई। मुझे नहीं पहननी थी वह शर्ट। उसमे उसकी बदबू थी। वही बदबू जिसमे अब मेरा दम घुटने लगा था। यह मुझे अट भी जाती, तो भी मुझे इसे नहीं पहनना था। बिस्तर पर छितराए कपड़ों में से मैंने एक टॉप चुना और वही पहन लिया। खुद को देखने ड्रेसिंग रूम की ओर बढ़ी तो देखा गिरीश अंकल वहीं खड़े हो कर मुस्कुरा रहे थे।

ये कैसे हो सकता है! मैंने तो कुंडी बंद की थी। पूरे समय दरवाज़े के सामने ही थी। ये अन्दर कब आए, और कहां से? जैसे भी आए, जब भी आए, वो मुझे देख सकते थे। वो मुझे पूरे समय देख रहा था। मैं चीख रही थी, पर आवाज़ बाहर नहीं आ रही थी। मैं किलस रही थी पर आंसू नहीं गिर रहे थे। वो मेरे पास आया, और मुझे शीशे की तरफ घुमा दिया। इससे पहले की कुछ समझ पाती, मेरी ब्रा में अपना हाथ डाल, स्तन ऊपर की ओर उठा दिए। “अब सही शेप आई ना। मैं तो तुम्हारी मम्मी को पहली बार देख कर ही समझ गया था कि यहाँ किसी को तो ब्रा पहनना सिखाना पड़ेगा।”

तभी मेरे मोबाइल पर मौसी का कॉल आया। मैं झट से उससे दूर हो कर फोन उठाने गई।

“कहां रह गई, बेटा? चेंज किया या नहीं?”

मैं कहना चाहती थी, “मौसी जल्दी आइए, मुझे नहीं जाना। आप यहाँ आइए। अभी आइए”। मैंने कहा कुछ भी नहीं।

“हेलो! हेलो! बेटा आवाज़ आ रही है? चेंज किया तुमने?”

मुझे आवाज़ आ रही थी। पर मेरी पुकार उन तक पहुंच नहीं पा रही थी।

“रुको, मैं आ ही रही हूँ। मुझे ऐसे कुछ सुनाई नहीं दे रहा।” अंततः उन्होंने सुन ही लिया।

इतने में गिरीश मेरे कपड़े देख रहा था। मेरे डेनिम शॉर्ट्स देख कर बोला, “दिस इज़ इट। चलो इसे पहन लो, बिटिया। मैं बाहर इंतज़ार करता हूँ।” ये अचानक से बदला हुआ रवैया मैं हज़म कर पाती इससे पहले वह कुंडी खोल कर बाहर निकल गया, और तभी सामने से मौसी आती दिखीं। दूर से ही इशारे से पूछती आ रहीं थी कि हुई तैयार, या बाकी है।

“शौर्ट्स निकाले हैं उसने अपने लिए। कुछ तो चुना मैडम ने। मैं गाड़ी में जा रहा हूँ। तुम इसके साथ आ जाना।” यह कहकर वह निकल गया। और मैं हाथ में शौर्ट्स लिए बस तमाशा देखती रह गई।

 

इस घर के जिस कोने में देखती, अब मन्हूसीयत ही नज़र आती थी। जितना करीब से देखती, कार्पेट और पर्दे उतने ही मैले दिखने लगे थे। ऊंची छतें अब कबीर के दोहे वाले खजूर के पेड़ सी लगतीं, जहां ना छाया मिलती ना सांत्वना। झूमर घर के कोने कोने के दीर्घस्थ्यायी अन्धकार को छिपाने का ज़रिया लगते और वह सुकूनदायक बिस्तर केवल एक प्रतिबिम्ब।

ऐसे में डांस अकादमी मुझे कम बेआराम लगने लगी थी। यह उस सन्नाटे भरे पिशाच बंगले से तो काफी सुरक्षित जगह थी यह अकादमी। यहाँ कोई मुझे छूता नहीं था। डांस अब भी नहीं होता था मुझसे पर यहाँ किसी की बातें तकलीफ नहीं देती थी। क्लास के आखिरी दिन तो नाचते नाचते मैं इतना थक गई कि मुझे अकादेमी में ही उबासियाँ आने लगीं। लग रहा था यहीं अभी ही सो जाउंगी। आखिरकार मैं सो सकती थी। कुछ देर का ब्रेक ले कर मैने एक कोना पकड़ लिया। शीशे की दीवार पर अपना सिर टिकाया, और नींद भरी आँखें मिचका लीं। तभी साथ डांस सीखने वाली तारा दीदी ने आ कर कहा, “सर आपको अन्दर हॉल में बुला रहें हैं”। मुझे चक्कर आ रहे थे। सिर दर्द नहीं कर रहा था, फिर भी लग रहा था कभी भी फट जाएगा। खुद को संभालते हुए, मुँह से चूआ लार पोंछकर मैने अपनी सैंडल पहनी और अन्दर हॉल में गई।

यहाँ गिरीश मेरा इंतज़ार कर रहा था। “आज मैं तुम्हे मॉडलिंग करना सिखाऊंगा।”

इस मॉडलिंग लेसन में उसकी मुझसे यह अपेक्षा थी कि मैं अपने कपड़े उतार दूँ, और सिर्फ हील्स पहन कर वॉक करके दिखाऊं। मेरी चिड़चिड़ाहट भांप कर उसने यह भी प्रस्ताव रखा कि यदि मुझे उसके सामने शर्म आती हो, तो बत्तियाँ भी बुझा दी जा सकती हैं।

मेरे फिर भी विरोध करने पर वह खुद बौखलाने लगा। उसे मेरी ना हजम नहीं हो रही थी। उसकी बेकरारी बढती जा रही थी।

“मैं आपको वॉक दिखाती हूँ” कह कर मैं हॉल के एक कोने में गई, और वहाँ से वॉक करते हुए सीधा हॉल के बाहर निकल गई। कुछ देर उस कमीने ने मेरा लौटने का इंतज़ार किया होगा। पर जब मैं नहीं आई तो बाहर देखने आया। अब तक मैने अपने ग्रुप के साथ अपना डांस अभ्यास शुरू कर दिया था। वह सबके बीच कुछ नहीं कर सकता था। चार दीवारी के बीच मेरा अकेलापन मेरी कमजोरी और उसका हथियार था। अभी सब के बीच वह निहत्था था, और पहली बार मैं सशक्त।

कुल मिला कर अब जितना वक़्त बचा था, उसमे मेरी कोशिश यही रहने लगी कि ज्यादा से ज्यादा समय शीला मौसी के आस पास रहूँ, ताकि वह भेड़िया अपनी हद में रहे। पर वह तो ठहरा अभिनायक, साला सारी नौटंकियाँ बीवी बच्चे के सामने ही दिखा लेता, और किसी को शक भी नहीं हुआ करता।

गिरीश के सामने कुछ भी कहती, तो बाद में उसका कुछ और मतलब ही निकाल के वही बातें दुहराता। जैसे उस रात खाना ना खाने की वजह देते हुए मैंने मौसी से कहा था कि मेरे पेट में दर्द है, फिर उनके पास ही लेट गई थी। गिरीश ना जाने कहां से बगल में आ कर मेरा पेट सहलाने लगा, और साथ साथ मौसी से बात भी करता रहा। पेट में इधर उधर हाथ लगा कर पूछता कि दर्द किधर ज्यादा है। मैंने कहा, “कहीं नहीं है। बाहर जा कर टहल लूंगी तो ठीक हो जाएगा”। मौका देखते ही उसे मौसी के पास छोड़, मीट्ठी के साथ मैं फ़ौरन बागीचे में भाग गई।

मीट्ठी साथ खेल ही रही थी के गिरीश फिर पीछे से आ गया, “चलो बच्चों, अब सोने का वक़्त हो रहा है। मीट्ठी, जाओ मम्मा गुड नाइट किस्सी का इंतज़ार कर रही है। मुझे तुम्हारी दीदी से अकेले में कुछ बात करनी है”।

मैं जानती थी कि ये फिर कुछ ऊट-पटांग बातें कहेगा, पर अब मुझे इसकी बातों का असर नहीं होता था। इसकी गंदी ज़ुबान के विरूद्ध मेरे अन्दर एक इम्यूनिटी सी बन गई थी मानो। मैं जान चुकी थी कि इससे ज़ुबान लड़ाने का कोई फायदा ही नहीं है, वो सुनेगा वही, जो सुनना चाहेगा। खुले माहौल में थोड़ी हिम्मत रहती थी मुझमे, ऐसे लगता था कि कोई ना कोई तो देख ही रहा होगा कहीं से, कुछ होगा तो शायद बचा भी ले।  

“पेट दर्द कैसा है अब?”

“ठीक है।”

“सच बताओ, तुम्हारा पेट दर्द नहीं हो रहा था ना?”

“..”

“अच्छा यह बताओ मैं जब पेट सहला रहा था तो भाग क्यों आई यहाँ?”

“ऐसे ही।”

“तुम्हारी शीला मौसी को लगा कि तुम्हे मेरे छूने से तकलीफ है। ऐसी तो कोई बात नहीं है ना? अब तुम एकदम से उठ कर यूं आ जाओगी तो कोई भी सवाल तो उठाएगा ही ना। बेवजह शीला के मन में शक डाल दिया तुमने।”

मैं चुप रही।

“अच्छा ये बताओ, जब मैंने तुम्हे छूआ तो कैसा लगा?”

“मतलब?”

“अन्दर से गुदगुदी सी महसूस हुई कुछ? उसे फोरप्ले कहते हैं।”

मैं कॉलेज ज़रूर जाती थी, पर कभी दोस्तों से ये बातें नहीं हुईं। फोरप्ले शब्द मैंने पहली बार सुना था। जहां अधिकतर लोगों के लिए फोरप्ले एक बहुत ही सुखद अनुभव होता है, वहीं मेरे दिल में इस शब्द की बस यही याद समा गई है कि इसे मैंने गिरीश से जाना था।

“देखो बिटिया, अब तुम बड़ी हो गई हो। सेक्स के बारे में बात करना ज़रूरी है। तुम्हारे पापा तो तुम्हे कभी बताएंगे नहीं, इसलिए मुझे ये सब करना पड़ रहा है। ऐसे ही रहोगी तो कोई भी लड़का फायदा उठा कर चला जाएगा। तुम्हे समझ होनी चाहिए कुछ बातों की।” यह कहते कहते उसने अपनी जेब से कौन्डम का एक पैकेट निकाला और मुझे थमा दिया। “यह देखा है कभी?”

मैं कौन्डम के बारे में जानती ज़रूर थी, पर पहले कभी इसे देखा नहीं था। इस लम्हे तक तो मुझे यह भी नहीं पता था कि यह पैकेट कौन्डम का है। मुझे यह किसी पान मसाले के पैकेट जैसा लगा। एक दिन पहले इस वाहियाद इंसान ने मुझे सिगरेट पिलाने की कोशिश की ही थी, तो लगा कि अभी पान मसाले से शुरुवात कराना चाहता है।

“यह कौन्डम है। लड़के अक्सर इसे ढंग से नहीं पहनते। इसलिए कभी भी सेक्स से पहले चेक कर लेना ज़रूरी है। चलो, इसे मुझे पहना कर दिखाओ अब, ताकि मैं देख सकूँ कि कितनी मेहनत की ज़रुरत है यहाँ।”

जब कौन्डम देखा ही पहली बार था, तो पहना कैसे देती। अब तो स्लो मोशन में सब कह दे रहीं हूँ, पर उस वक़्त इतना ना सोच पाती थी ना सोचने का वक़्त होता था। इधर एक तरफ वो अपना ज्ञान झाड़ रहा था, और मैंने रिफ्लेक्स एक्शन में कौन्डम ज़मीन पर फेंक दिया।

“अरे अरे! गंदा हो जाएगा, एक ही बचा है मेरे पास अभी, क्या कर रही है?”

मेरे पास कोई जवाब नहीं था।

उसने एक हाथ से कौन्डम का आधा फटा हुआ धूलदार पाकेट उठाया, दूसरे हाथ से मेरी कलाई कस के पकड़ ली। फिर मेरे हाथों की उँगलियों में कौन्डम पहनाया। वो क्या कह रहा था साथ में, मैंने सुना ही नहीं। मेरी पांचो इन्द्रियाँ काम कर भी रहीं थी और नहीं भी। मैं सुन सकती थी कि वह कुछ तो बोल रहा था, पर उसकी बातों का कोई मतलब नहीं बन रहा था। कुछ भी समझ नहीं आ रहा था। मैं देख सकती थी कि वो कैसे सहला सहला कर मेरी उँगलियों में कौन्डम डाल रहा था, पर सब कुछ फिर भी धुंधला था। अभी कुछ ही वक्त पहले तो मुझे बड़े आत्मविश्वास के साथ यह लग रहा था कि मैं मानसिक रूप से तैयार हूँ इस इंसान की हर गन्दी हरकत के लिए, पर मुझे अब पता चल रहा था कि मैं तैयार नहीं थी। मुझे यह नहीं चाहिए था। अब तक जो जो हुआ, मुझे उसमें से कुछ भी नहीं चाहिए था। मुझे अपने हाथ से घिन आ रही थी। मुझे उस बदबू से घिन आ रही थी। अब सब्र का बाँध टूट रहा था। अब और नहीं हो रहा था।

घर के किसी भी कोने में रहूँ, उसकी बदबू नहीं जाती थी। कितना भी रगड़ रगड़ के नहाऊं, उंगलियाँ साफ़ नहीं होती थीं। मुझे पता था कि वो गंदा है, पर मुझे घुटन हो रही थी यह सोच कर कि अब मैं भी गन्दी थी।

किसको बताती कि फोन में रिचार्ज कम था, और रिचार्ज के पैसे भी नहीं थे। घर पर जब बात हुई थी दो दिन पहले, तो मम्मी पापा इतने खुश थे, कि उनकी बेटी वेकेशन पर है। कैसे बताती कि मुझे अपने घर का कड़ा बिस्तर याद आ रहा था। ए.सी. नहीं, पंखे में सोना था। बड़ी बड़ी खिड़किया नहीं, घर के सामने वाला छोटा सा पार्क चाहिए था। कुछ देर के लिए ही सही, मुझे नींद चाहिए थी।

जैसे जैसे दिल्ली वापस आने का वक़्त नज़दीक आया, हर गुज़रते मिनट के साथ मन में बस एक ही बात दोहरे जा रही थी- मुझे सोना है। कोई सुला दो मुझे। कोई सोने दो मुझे।

एक वह रात थी जब लखनऊ आने के उतावलेपन में याद ही नहीं कि कब जागी, कब सोई। और एक आज की रात थी, जो पूरे होशों-हवास में बिन आँखे झपकाए बिता दी। तब वक़्त का पता नहीं चल रहा था, और आज मेरी नज़रें बस घड़ी के काँटों पर टिकी थीं। कोई बेचैनी नहीं थी, बस इंतज़ार था।

अगली सुबह सबके जागने से पहले, मैं नहा धो कर अपना बस्ता बांधे तैयार थी।

रास्ते में दिल्ली का साइन बोर्ड देख कर दिल को एक तसल्ली सी मिली, पर इतनी सी तसल्ली मेरे लिए काफी नहीं थी।

अपने घर पहुँचते ही, मैं सीधा अपने कमरे में बिस्तर पर गई, और सो गई। घंटों बाद बीच में जब नींद खुली, तो वहीं बैठ कर मम्मी पापा बातें कर रहे थे- “वैसे तो लखनऊ दिल्ली से ज्यादा दूर नहीं, पर गर्मी के मौसम में रोड ट्रिप की थकान बदन में सुस्ती सी भर ही देती है। अच्छा है सुकून से सो रही है श्रुति”।

मैं फिर सो गई।

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श्रुति दिल्ली विश्वविद्यालय के एम.आई.एल. विभाग में पी.एच.डी. शोधकर्ता हैं, जिनका अनुसंधान भारतीय साहित्य में सेक्स कर्मचारियों के प्रतिनिधित्व से जुड़ा है। उनके लेख जी कैफे, रायसिना हिल, भारत बोलेगा एवं बुलंद प्रजातंत्र जैसी वेबसाईटों पर पढ़े जा सकते हैं। श्रुति नारीवाद से जुड़ी संस्था 'लेडीज़ टॉयलेट' की संस्थापक भी हैं।