माँ डरती है

अंजली काजल

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यह एक बड़ा शहर है। महंगे बाज़ार, ऊंची इमारतें, बहुत सी गाडियाँ और महंगाई ! बड़े शहरों की सरहदों पर कुकुरमुत्तों की तरह बिछी होती हैं यह बस्तियाँ। इन बस्तियों में रहने वाले लोग न गाँव वासी हैं, न शहरवासी। ये लोग हैं बस्तियों में रहने वाले आम लोग। इस शहर की सरहद पर बसी एक बस्ती के एक छोटे से घर में माँ रहती है। शमशान घाट के पास कुछ घर बने हुए हैं। इन्हीं घरों में उसका भी एक कमरे वाला छोटा सा घर है। छोटा सा आँगन है। चारदीवारी नहीं है। माँ आँगन में लगे पेड़ के नीचे चारपाई पर बैठी है। चारदीवारी न होने के कारण वहीँ आंगन में बैठे-बैठे गली के अंत तक देखा जा सकता है। माँ की नज़र बार बार घूमती, गली के अंत तक हो आती फिर निराश होकर उसी तरह वापस लौट आती। गर्मियों की इस नीरस दोपहर को और भयानक बना रहा है सुनसान गली का सन्नाटा। कोई भी बाहर दिखाई नहीं देता। उसकी बेचैनी बढ़ने लगी। वो उठकर बाहर गली में आकर खड़ी हो गई और फिर देखने लगी गली के अंत में। वहाँ कोई नहीं है। उसकी नज़र को उम्मीद है कि गली के अंत में जसबीर साइकिल पर सवार आ रही है। खड़ी-खड़ी वो पसीने से तर हो गई। वापस मुड़ी थी कि तभी पास के मकान के दरवाजे में खड़ी पड़ोसन की आवाज़ उसके कानों में पड़ी,

 

'क्या हुआ, तुम यहाँ खड़ी हो?'

 

माँ ने अंदर की खीज को ज़ाहिर न करते हुए कहा, 'कुछ नहीं। टिंकू अपने मामा के घर गया था, अभी तक नहीं लौटा।'

 

माँ ने बड़ी सफाई से झूठ बोला, पर वो अगला वार करना नहीं भूली-

 

'जसबीर आ गई क्या?'

 

'नहीं, आज उसे ज़रा देर से आना था, बताकर गई थी।'

 

माँ फिर जाकर चारपाई पर बैठ गई। सामने शमशान घाट दिखाई देता है। एक क्रूर सी  चुप्पी  है, सुनसान है। उसे झुरझुरी सी हुई। आज जसबीर को लौटने में बड़ी देर हो गई है। सच तो यह है कि वो आज कुछ बताकर भी नहीं गई कि देर से लौटेगी। माँ ने उसके लिए कब का खाना बनाकर रखा हुआ है।

 

जिम्मेदारियों से बंधी हुई दिनचर्या है जसबीर की। बी.ए. फ़ाइनल की परीक्षा देकर भी उसे घर बैठना नसीब नहीं है। कॉलेज दूसरों के लिए बंद है, पर उसे फिर भी जाना पड़ता है। जसबीर जूडो की कोच है। कॉलेज की तरफ से बहुत सी प्रतियोगिताओं में खेली है और बहुत से इनाम जीते हैं उसने। अब पढ़ाई  के साथ-साथ एक स्कूल में कोच भी है।

 

माँ ने अंदर जाकर दुबारा घड़ी देखी। चार बजने को है। उसने सोचा, पाँच बजे तो उसे टियूशन पढ़ाने दूसरी जगह जाना है। माँ को याद आया, जसबीर ने किस तरह ज़िद करके, कभी समझाकर माँ, पापा और भाई को राज़ी किया था टियूशन पढ़ाने के लिए। रोज़गार की तलाश और बच्चों को पढ़ाने की खातिर वे लोग गाँव से शहर आये थे। वैसे भी दलितों के लिए गाँव में क्या रखा था? ना किसी के पास अपनी ज़मीन थी कि खेती करके पेट पाल लें, ऊपर से दूसरों के खेतों में काम करके खाली दानों का जुगाड़ होता था। बच्चों की पढ़ाई , बीमारी आदि का खर्च उठाना मुश्किल होता था। टिंकू अभी स्कूल में ही पढ़ता है। पिता ने यहाँ आकर हौज़री के कारखाने में मशीन चलाने का काम कर लिया। घर का खर्चा कितनी मुश्किल से चलता है, इसका एहसास जसबीर को था। एक दिन उसे दो लड़कों को इक्नोमिक्स पढ़ाने का प्रस्ताव आया। जसबीर किसी भी तरह इसके लिए माँ -पापा को तैयार कर लेना चाहती थी। सबसे बड़ी दो ही बाधायेँ थीं। पहला, टियूशन लड़कों को पढ़ानी थी। दूसरा, टियूशन बस्ती के पास लगते एक छोटे से गाँव में उनके घर जाकर पढ़ानी थी। पर फिरभि बहुत समझाकर आखिर उसने अपने माँ-पापा को राज़ी कर ही लिया था। उन लड़कों के पिता खुद आकर जसबीर के माँ-बाप को आश्वस्त करके गए थे।

 

इस तरह रोज़ शाम पढ़ाने साइकिल से जाने लगी जसबीर। आस पड़ोस का माहौल लड़कियों के लिए बेहद घुटन भरा था। हर कोई एक दुसरे के जीवन में दखल देता था। छोटे कस्बों में हर किसी की बेटी पर नज़र रखी जाती। लड़कियां इतने बंद माहौल में पाली जातीं कि आत्मविश्वास की कमी उनमे जीवनभर के लिए रह जाती. जसबीर को अपनी निजी ज़िंदगी में किसी का दखल पसंद नहीं। हैरत की बात थी कि यह लोग कभी पूछने नहीं आते कि आपका लड़का कहाँ गया और कब आएगा? इन्हें बर्दाश नहीं कि कोई लड़की इस तरह निर्भीक होकर पढ़ती है। आत्मनिर्भर बनने की कोशिश करती है । एक दिन जसबीर को कुरेदकर पूछने वाली एक औरत को उसने बुरी तरह डांट दिया था। तब से यह लोग और भी जलते हैं। जसबीर को इन औरतों की परवाह नहीं थी पर कभी-कभी उसे इन औरतों पर तरस आता। इनका दोष इन्हे अज्ञान बनाकर रखा जाना है। शिक्षा से दूर रखा जाना है। बचपन से घर परिवार, चूल्हा चौका, पति-बच्चे संभालना ही उनका मकसद है ये इनकी ट्रेनिंग में शामिल रहा. इनकी दुनिया यहीं से शुरू और यहीं पर खत्म होती थी।

 

माँ अगर कभी 'लोग क्या कहेंगे' वाली कोई बात करती तो जसबीर कहा करती है, 'माँ तुम यह बातें सोचना छोड़ दो कि चिड़िया क्या कहेगी, कौवा क्या कहेगा।'

 

उसकी यह बात याद करके माँ के होंठो पर हंसी फैल गई। पर माँ क्या करे? जसबीर घर में रहती ही कितना है और बच्चों का पिता अपने काम पर चला जाता है। लड़का अपने दोस्तों में मस्त रहता है। रह जाती है अकेली माँ। उसे तो आखिर इन्ही लोगों में रहना है। जसबीर के मन में बहुत रोष भरा रहता है इन लोगों के लिए। माँ को याद आ रही है जसबीर की कही बातें- “माँ तुम किन लोगों की परवाह करती हो? किन लोगों से शर्म करना चाहती हो? यह सब नंगे हैं ! यह कुंठायों के शिकार लोग हैं। इनका न अपना कुछ बना है न ये दूसरों का बनने देना चाहते हैं। वो अपने मुहल्ले की बबली तुम्हें याद है। बबली जब स्कूल में पढ़ती थी, जब वो दो ऊंची बेढंगी चोटियाँ बनाकर, ऊंची सलवार बांधकर, सिर झुकाकर चलती थी, तब यह मोहल्ले की जजें (जो तय करती हैं कौन सी लड़की शरीफ है और कौन खराब) को नमस्ते करने के लिए सिर उठाती थी, उस बबली को मोहल्ले वाले 'बहुत शरीफ लड़की है' कहते थे और वही बबली जब कॉलेज जाने लगी थी, जब उसने इस बस्ती के बाहर कदम रखा था, जब उसे पहनने-ओढ़ने का शऊर आ गया था, वो खुद को संवारना सीख गई, गली में सिर उठाकर चलना सीख गई, तब वही बबली इनके लिए बिगड़ गई थी। यह लोग अपने लड़कों को उसके पीछे भेजते थे देखने के लिए कि वो कहाँ-कहाँ जाती थी। कॉलेज के बहाने कहीं और तो नहीं जा रही। ताकि एक अच्छा ख़ासा स्कैंडल बना के उसे घर बैठने पर मजबूर किया जा सके। मैं गली में खड़े चार वाहियात लड़कों को देखकर नज़र नीचे नहीं करुँगी। मैं इनसे नहीं डरती।”

 

फिर भी माँ आज जसबीर को पूरा सहयोग करती है। लोगों की बातों का जवाब भी देती है और उसका हौसला भी बढ़ाती है। क्योंकि वह चाहती है उसकी बेटी अपने परों पर खड़ी हो। माँ को हैरत होती है कि वह अपने दिनो में अपने अधिकारों के लिए न घर वालों से लड़ पाई, न बाहर वालों से। उसमें शायद इतनी हिम्मत ही नहीं थी। पर आज अपनी बेटी के लिए वो किस तरह डटकर खड़ी हो गई है। माँ ने एक कष्ट भरी ज़िंदगी जी है! पति के मुकाबले वो बिल्कुल अनपढ़ थी। तमाम उम्र अपने आपको दूसरों पर बोझ कि तरह महसूस करती रही। माँ चाहती है जसबीर काम करे, तब ही उसकी शादी हो। कोई भी माँ की  खुशी का अनुमान नहीं लगा सकता जब जसबीर को कॉलेज में सम्मान मिलता है, जब वो जीतकर आती है कविता, ड्रामा, जूडो-कराटे की  प्रतियोगिताएं!

 

पर चिंता का यह कैसा ज़हर है जो उसकी रग-रग में दौड़ने लगा है ? उसे रह रहकर पसीना आ रहा है। धड़कन बढ़ने लगी है। अपने आपको सहज करने के लिए वो खुद को दिलासा देने लगी, “भला मैं इतना क्यों डर रही हूँ? उसे देरी हो जाने के कई कारण हो सकते हैं। खुद जसबीर मुझे सौ बार कह चुकी है कि अगर उसे देर हो जाए तो मैं चिंता न किया करूँ।” इस सोच से उसे ज़रा सी राहत मिली।

 

अपने डर को टटोलने के बाद वो इस नतीजे पर पहुँची कि उसका डर एक घटना के साथ जुड़ा हुआ है। ये ऐसी घटना थी जिसके कारण सब जसबीर की प्रशंसा करते हैं। जिस घटना की खबर अख़बार में भी छपी थी। वह खुद भी इस घटना के बाद अपनी बेटी पर गर्व महसूस करती है। फिर भी डर है कि माँ को जब तब घेर लेता था?

 

आज से चार पाँच महीने पहले की बात है। जसबीर कॉलेज से घर वापस आ रही थी। शहर के सबसे सुंदर और शांत जगह पर है जसबीर का कॉलेज। सिविल लाइंस में से निकलते हुए उसपर एक अजीब सा उन्माद छाने लगता। साफ चौड़ी सड़कों पर कहीं कोई गड्डा दिखाई नहीं देता। अगर कहीं गड्डा दिखाई देता भी है तो कुछ ही दिनो में सड़क फिर समतल कर दी जाती है। लोग वहाँ तेज़ रफ्तार से चलते हैं। फिर भी यहाँ कोई ख़तरा नहीं। उसको इन सड़कों पर तेज़ साइकिल चलाना अच्छा लगता है। सबसे ज्यादा अच्छा उसे यह लगता है कि इस जगह से गुज़रते हुए उसके साथ बहुत कम छेड़छाड़ की घटनाएँ होती थी।

 

इसके बाद शुरू होती हैं भीड़-भरी तंग सड़कें, बाज़ार और सब्जी मंडी। यहाँ हर कोई ऐसे चलता है जैसे उसे कोई इंटरव्यू देने जाना है और वह लेट हो रहा है या कोई ऐसे काम से जाना है जो उसके बिना संभव नहीं। किसी स्कूटर वाले, कार वाले, रिक्शा वाले को परवाह नहीं कि उसका वाहन किसी को साइड मारकर जा रहा है या किसी का संतुलन खराब करके जा रहा है। और अगर वह लड़की है तो साइड मारने में और भी मज़ा आता है। जान-बूझकर नज़दीक से सटकर जाना इनका अधिकार है। इसके कई फायदे होते हैं मसलन शरीर का गुदगुदा स्पर्श भी मिल जाता है या फिर वे अस्त-व्यस्त हो जाती हैं। कई बार उनका दुपट्टा सरक जाता है या उनके चेहरे पर इस अचानक हमले से घबराहट के कई रंग आते जाते हैं। इन रंगों से खेलना इनका शौक है। और ज्यादातर वे आगे से कुछ कहती भी नहीं हैं। कहती हैं तो कुछ कर नहीं सकतीं और अगर झगड़ा करने पर उतरतीं हैं तो मुह से इतनी गंदी गलियां बको कि वे शर्म से पानी हो जाएँ। इससे ज्यादा कुछ नहीं कर पाती हैं लड़कियाँ।

 

इस भीड़ भरे बाज़ार की ही तो बात है। जब एक दिन वो कॉलेज जा रही थी। एक स्कूटर वाला उसके पास से अंधाधुन चलता हुआ सटकर निकल गया। उसे कपड़ा फटने की आवाज़ सुनाई दी। उसने देखा, उसके कमीज़ की पूरी बाजू कंधे तक फट गई है जो उसकी बांह को पूरा नंगा कर चुकी है। उसने गुस्से से आगे बढ़ गए स्कूटर वाले को देखा। उसे कभी भूल नहीं सकती वो ज़लील और ज़हरीली हंसी। वो अब कुछ नहीं कर सकती थी। वो अब तक बहुत आगे निकल चुका था। उसने अपना आधा दुपट्टा बांह के ऊपर लपेट लिया और आधा गले में ही रहने दिया। बड़ी मुश्किल से वो कॉलेज पहुँची थी।

 

कितना अपमानित महसूस किया था उसने ! एक बार तो उसे दुनिया की हर शय से नफरत सी हो गई थी। उसके आस पास के लोग कुछ खुश हुए थे, कुछ उसकी नंगी बांह को देख रहे थे। उसे लगा, सबके चेहरों पर आँखें नहीं कांटे उगे थे।

 

“हमने ऐसा कौन सा गुनाह किया कि हम यह ज़लालत सहें?” उसके अन्दर गुस्सा ही गुस्सा भर गया था।

 

इस तरह की घटनाओं पर घरवालों या सुनने वालों का जवाब अक्सर यही होता है, ‘तुमने उसे जूते क्यों नहीं मारे? तुमने उसे थप्पड़ क्यों नहीं मारा?’ पर कितनी लड़कियां असल में ऐसे लोगों से भिड पाती हैं? वो नहीं समझा सकती उन्हें कि वह किस-किसको जूते से मारें? छोटी बस्तियों से आने वाली लड़कियाँ, दूर-दराज, गाँव-देहातों से आने वाली लड़कियाँ रोज़ नजाने क्या कुछ झेलती हैं। क्या रास्ते भर वो अपना जूता उतारकर चले? पर वो चाहती ज़रूर है! चाहती है वो इक्कीसवीं सदी की ओर बढ़ते और कीड़े-मकौड़ों की तरह विचरते इस समाज के मुह पर थप्पड़ मारना, जिसने अभी तक स्त्री को देह से अलग समझना शुरू नहीं किया।

  

खैर! उस दिन भी जसबीर इस बाज़ार से बचती बचाती निकलकर अब अपनी बस्ती की सरहदों पर पहुँचने वाली थी। उसे लगा कोई स्कूटर उसका पीछा कर रहा है। बहुत धीमी रफ्तार से स्कूटर उसके पीछे चल रहा है। वो बिल्कुल वैसे ही चलती रही जैसे चल रही थी जैसे कुछ भी नहीं जानती। तभी स्कूटर तेज़ करके आगे निकाल लिया गया। उसपर दो लड़के सवार थे। उसने सोचा चलो राहत मिली पर अब स्कूटर बहुत धीमी रफ्तार से उसके आगे चलने लगा। फिर कई बार उन्होने स्कूटर कभी आगे कभी पीछे करके उसे तंग किया। जसबीर को बहुत खीझ उठी, पर वो अच्छी तरह से जानती है इस तरह के  लड़कों को। अब अगर वो इन्हें कुछ कहेगी तो यह लोग कहेंगे,“हमने तुम्हें कुछ नहीं कहा। हमने क्या किया? हम तो आराम से जा रहे हैं” और यह सच है कि वे कुछ कह नहीं रहे। कुछ देर यह खेल खेलकर मन बहलाकर वे चले गए।

 

अब अपनी बस्ती में पहुँच चुकी है वो। खीझ और गुस्से से भरी हुई है। पता नहीं सड़क पर जगह-जगह बने गड्डों पर की पुरुष जाति पर! साइकिल चलाते-चलाते अब उसके पैर भी थक गए हैं। तभी पीछे एक साइकिल पर सवार दो लड़के उसके साथ चलने लगे। वो सोच रही है कि मैं इनको नज़रअंदाज़ कर दूँगी, क्योंकि अब घर आने ही वाला है।

 

पहले एक बोला,“सोहनेयों की हाल है जी?”

 

उसने कोई जवाब नहीं दिया।

 

“बोलोगी नहीं” दूसरा बोला।

 

अब की बार उसे बहुत गुस्सा आया, फिर भी वो चुप रही। इसके बाद उन लोगों ने एक गन्दी  गाली बोलते हुए गन्दा इशारा किया. जसबीर को अपने गुस्से पर काबू नहीं रहा। उसने गुस्से में कहा,

 

“बता ही दूँ तुम्हें?”

 

वो बेख़ौफ़ बोले थे,

 

“क्या बताएगी तू?”

 

जसबीर ने रुककर अपनी साइकिल छोड़ दी, जो ज़मीन पर गिर गई और उनकी साइकिल को एक ज़ोर के झटके के साथ इस तरह धक्का दिया कि वे दोनों बहुत धड़ाम  से ज़मीन पर आ गिरे। उस सड़क के साथ-साथ दुकानों की लंबी कतार थी, वहाँ पर मौजूद लोगों ने चौंककर उधर देखा। इससे पहले वे लोग सख्त सड़क पर गिरने से संभल पाते, जसबीर ने उनको बुरी तरह पटकना शुरू कर दिया। जूडो की खिलाड़ी के भारी वार सह पाना उन लोगों के बस की बात नहीं थी। जसबीर ने उनके पेट पर कई वार किए। अब काफी भीड़  इक्कठा हो चुकी थी। कुछ दुकानदारों ने उन लड़कों को छुड़ाया। उन दोनों की नाक और मुंह से खून बह रहा था। एक सरदार जी जसबीर से लगातार पूछ रहे थे, “पुत्तर होया की है?” जसबीर ने जब छेड़छाड़ वाली बात बताई तो सरदार जी ने एक जोरदार थप्पड़ खुद भी दे मारा उन  लड़कों को। वे दोनों डर गए, रोने लगे और माफी भी मांगने लगे।

 

वहाँ मौजूद लोगों के मुंह हैरानी से खुले रह गए थे। उन्होने जसबीर को शाबाशी दी।

 

उस दिन के बाद यह बात जंगल की आग की तरह उस बस्ती में फ़ैल गई। इस घटना की खबर अखबारों में भी छपी। जसबीर के कॉलेज में भी पहुँची। अध्यापको ने भी उसकी तारीफ की। जसबीर हम सब लड़कियों की नायिका बन गई थी।

 

अब तो बहुत देर हो गई इस घटना को। पर माँ को आज किस बात का डर सताता रहता था? जसबीर के इतनी देर तक घर न लौटने के कारण उसे बुरे ख्याल आते हैं। पर मैं नकारात्मक ही क्यों सोचती हूँ? उसने अपने आपसे पूछा। अख़बार की खबरें हमारी दिनचर्या का हिस्सा हो गई हैं। हम उन्हें सुनते हैं, पढ़ते हैं, अफसोस ज़ाहिर करते हैं और भूल जाते हैं। पर क्या हम सचमुच भुला पाते हैं? जब हमारा कोई अपना बिना सूचना देर तक नहीं लौटता, यही खबरें परत दर परत हमारे सामने उधड़ने लगती हैं, माँ को डर है कहीं वे लड़के जसबीर से बदला लेने की कोशिश न करें। नहीं, वो ऐसा नहीं कर सकते। उनकी इतनी हिम्मत नहीं हो सकती। वे बहुत डरे हुए थे उस दिन। अब तो शायद वे किसी लड़की को देखने की कभी हिम्मत भी नहीं कर पाएँगे। माँ ने इस ख्याल को झटकने की कोशिश की। वो थककर चारपाई पर बैठ गई। इतने में माँ ने देखा, जसबीर आ रही है।

 

माँ ने बहुत बेसब्र होकर पूछा,“सब ठीक तो है?”

 

जसबीर बहुत थकी हुई थी। माँ को एहसास हुआ कि उसने आते ही उससे सवाल करके भूल कर दी थी। वह अक्सर घर आकर कुछ देर बात नहीं करती। रास्ते में न जाने वो कितना गुस्सा लेकर आती थी।

 

“ठीक है” उसने थके हुए स्वर में कहा। माँ का चेहरा देखकर उसे तरस आया। माँ उसके लिए पानी लेकर आई थी।

 

"इतनी देर कैसे हो गई? कम से कम बताकर तो जाया करो। तुम्हें नहीं पता क्या हाल हुआ है मेरा। मैं तो तुम लोगों की फिक्र करते-करते ही मर जाऊँगी किसी दिन।

 

“माँ, मेरे कुछ स्टूडेंट परसों कंपटीशन में जा रहे हैं। समय बहुत कम है। उन्हे इसकी सूचना आज ही मिली थी। आज प्रैक्टिस करना जरूरी था। मैंने पड़ोसियों के घर फोन मिलाया भी था पर किसी ने फोन ही नहीं उठाया। और मैंने तुम्हें कितनी बार कहा है मुझे देर हो तो चिंता मत किया करो। तुम चिन्तित होगी, यह सोचकर मैं भी वहाँ परेशान रही।”

 

जसबीर ने फिर देखा, माँ का चेहरा मुरझाया हुआ था। वो बहुत बीमार सी लग रही थी। उसे फिर एक बार उसपर दया आयी।

 

“माँ तुम बैठो यहाँ पर। बताओ, तुम्हें आखिर क्या हो जाता है? तुम्हें डर क्यों लगता है?”

 

“बेटी तुम्हें नहीं पता इस दुनिया का। समाज में औरत होना इतना आसान नहीं।

 किसी का कुछ पता नहीं, मन में क्या पाल ले। वे लड़के नजाने किस घर के थे? बैर पड़ने में समय नहीं लगता।”

 

जसबीर अंदर तक तड़प उठी।

 

“अच्छा! तो तुम यह सब सोचती रही हो! माँ सहना किसे कहते हैं तुम्हें तो पता है? इन लड़कों को क्या पता कि कैसा लगता है एक लड़की को जब उसपर फब्तियाँ कसी जाती हैं, गन्दे इशारे किए जाते हैं, गंदी गालियाँ बकी जाती हैं, उसको ठोकर मारी जाती है, उसपर ज़हरीली हंसी फेंकी जाती है, उसका कपड़ा फाड़ा जाता है, उसके अंगों को छुआ जाता है ! क्या हम तमाशा हैं माँ? या चलती फिरती लाशें? आज यह सड़क पर कपड़ा फाड़ते हैं, कल बाज़ार में नंगा करेंगे हमें, तालियाँ बजाएंगे ! क्या मैं तमाशा हूँ?”

 

माँ आश्चर्यचकित और भयभीत जसबीर के फड़कते हुए होठों को देखती रही!

 

“ये लोग ऐसे घूरते हैं जैसे असंख्य, गन्दे, लिजलिजे कीड़े मेरे शरीर पर रेंग रहे हों”

 

बेटी की बातों को सुनकर माँ के रोंगटे खड़े हो गए।

 

“मैं घर में कैद होना नहीं चाहती. माँ ज्यादा सोचा मत करो, किसी से डरा भी न करो”

 

जसबीर हँसती है, माँ भी।

 

“अब तुम हाथ मुंह धो लो। मैं खाना गरम करती हूँ”

 

अब माँ उस लड़की से भी डरने सी लगी है।

 

***